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ISSN: 3108-0766 (Online)

Intelligentsia International Journal of Multidisciplinary Research

Vol-1, Issue-3, Oct- Dec, 2025

ज्ञान एवं पाठ्यक्रम : प्रतिमान प्रतिस्थापन एवं अभिनव प्रवृतियाँ
प्रो. डॉ. विभूति भूषण मलिक
Original Article Published Online on: Volume (1), Issue (3), October - December, (October 09, 2025)

सार :
"ज्ञान क्या है?" - यह एक अत्यंत जटिल प्रश्न है, जिसका उत्तर शायद हर किसी के पास है, और शायद किसी के पास नहीं। परंतु एक बात निर्विवाद है: कोई व्यक्ति किसी तथ्य या घटना को या तो जानता है, या नहीं जानता। सामान्यतः यह माना जाता है कि ज्ञान, सत्य की खोज की एक निरंतर प्रक्रिया है (स्टैनफोर्ड)। यह खोज मानव इतिहास की शुरुआत से ही चली आ रही है, क्योंकि मनुष्य जीवनभर ज्ञान अर्जन की ओर अग्रसर रहता है। आधुनिक युग में यह ज्ञान प्राप्ति एक संगठित व्यवस्था के रूप में शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत आती है, जिसका आधार है – पाठ्यक्रम (Curriculum)। पाठ्यक्रम केवल विषयों की सूची नहीं, बल्कि यह एक संपूर्ण शिक्षण ढांचा है, जो यह तय करता है कि, क्या पढ़ाया जाए, क्यों पढ़ाया जाए, कैसे, किसे और किसके द्वारा पढ़ाया जाए, तथा शिक्षण के पश्चात, क्या सीखा गया, और व्यवहार में कैसा परिवर्तन आया। समाज और समय कभी स्थिर नहीं रहते – वे निरंतर परिवर्तनशील हैं। हर युग में ज्ञान और विज्ञान की परिभाषा, उसकी पद्धतियाँ और दृष्टिकोण उस समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक सोच से प्रभावित होती रही हैं। उदाहरणस्वरूप, प्राचीन यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की आदर्शवादी विचारधारा प्रचलित थी, वहीं भारत में वैदिक दर्शन ने ज्ञान को आध्यात्मिक संदर्भ में परिभाषित किया। संभवतः उस समय की आवश्यकताओं और परिस्थितियों ने यही विचारधाराएँ जन्म दीं। आज के युग में विचारधाराओं का स्वरूप बदल चुका है। उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-आधुनिकता, नव-पारिस्थितिकी और समावेशन जैसे दृष्टिकोण हमारे ज्ञान और पाठ्यक्रम को प्रभावित कर रहे हैं। किसी भी कालखण्ड में वह विचार, दृष्टिकोण या प्रतिमान (पैराडाइम) जो ज्ञान एवं विज्ञान की पद्धतियों को अपने भीतर समेट लेता है, वही उस समय का "निदर्शन" या प्रतिमान या दृष्टिकोण या विचारधारा कहलाता है। जब पुराने निदर्शन को एक नया निदर्शन प्रतिस्थापित करता है, तो यह परिवर्तन "पैराडाइम शिफ्ट" निदर्शन प्रतिस्थापन कहलाता है। इस अध्याय का मूल उद्देश्य यही—समझना है कि  "ज्ञान और पाठ्यक्रम" की वर्तमान प्रवृतियाँ क्या है और वे किस निदर्शन, विचार, दृष्टिकोण या प्रतिमान (पैराडाइम) से प्रभावित हो रही है।

कुंजी शब्द :
ज्ञान, पाठ्यक्रम, निदर्शन

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Cite : मलिक, वि.वि. (2025). ज्ञान एवं पाठ्यक्रम : प्रतिमान प्रतिस्थापन एवं अभिनव प्रवृतियाँ. इंटेलिजेंटसिया इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च, 1(3), 1–9 .
प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा एवं शिक्षा
डॉ. अनिल कुमार सिंह
Original Article Published Online on: Volume (1), Issue (3), October - December, (October 09, 2025)

सार :
भारत अनादि काल से ज्ञान-विज्ञान की भूमि रहा है। यहाँ वेदों, उपनिषदों, दर्शनशास्त्र, आयुर्वेद, गणित, खगोलशास्त्र, वास्तु और योग जैसी परम्पराओं ने न केवल शिक्षा को दिशा दी, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शन का कार्य किया। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्वभर के विद्वानों को आकर्षित किया और भारत कोविश्वगुरुका गौरव प्रदान किया। किन्तु कालांतर में उपनिवेशवाद, आक्रांताओं के प्रभाव और आधुनिक भौतिकतावादी प्रवृत्तियों के कारण यह समृद्ध परम्परा हाशिये पर चली गई और लुप्तप्राय सी हो गई।मौजूदा समय में भारतीय ज्ञान परम्परा आंदोलन ने इसे पुनः नए सिरे से देखने और समझने का अवसर प्रदान किया है। शिक्षा के क्षेत्र में आज योग, आयुर्वेद, भारतीय गणित और नीतिशास्त्र जैसे विषयों पर शोध की अभूतपूर्व गति दिखाई दे रही है। विश्वविद्यालय और शोध संस्थान पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर नए प्रतिमान गढ़ रहे हैं। यह न केवल हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की वैचारिक धरोहर को साझा करने का माध्यम भी है।निसंदेह इस पुनरुत्थान से भारतवासी अपनी मौलिक परम्पराओं के प्रति गर्व और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होंगे। हालांकि सबसे बड़ी चुनौती इसे व्यावहारिक स्वरूप देने और वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की है। यदि भारतीय ज्ञान परम्परा को आधुनिक शिक्षा, तकनीक और नवाचार के साथ संतुलित रूप से जोड़ा जाए तो यह न केवल शिक्षा को समग्र बनाएगी, बल्कि विश्व को भी शाश्वत मूल्यों और जीवन दृष्टि की नई दिशा प्रदान करेगी। यही भारतीय ज्ञान परम्परा का सच्चा पुनर्जागरण होगा।

कुंजी शब्द  :
भारत, ज्ञान, परम्परा, शिक्षा

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Cite : सिंह, ए. (2025). प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा एवं शिक्षा. इंटेलिजेंटसिया इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च, 1(3), 10 – 14 .
पुष्पा प्रियदर्शनी ‘पुष्प’ के रचनाओं में सामाजिक एवं मानवीय चेतना
मिथलेश दास
Original Article Published Online on: Volume (1), Issue (3), October - December, (October 09, 2025)

सार :
साहित्य के महान महासागर में कुछ करना अतिशय सूक्ष्म होता है किंतु इस सूक्ष्म में भी छोटा से छोटा योगदान भी अतिशय मन को अनन्य सुख प्रदान करती है"—पुष्पा प्रियदर्शनी की यह पंक्ति न केवल साहित्य के प्रति उनके गहरे अनुराग और समझ को व्यक्त करती है, बल्कि यह साहित्य के महत्व को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है। उनके अनुसार, भले ही साहित्य का योगदान प्रतीत होने में सूक्ष्म हो, फिर भी वह आत्मिक संतोष और आनंद की अनंत गहराई प्रदान करता है। साहित्य, कला और संस्कृति की वह एक अद्भुत पुष्प थीं जिन्होंने साहित्य के बगिया को और अधिक सौंदर्य प्रदान किया था, लेकिन अफसोस कि असमय उन्होंने इस संसार को अलविदा ले लिया। पुष्पा प्रियदर्शनी भारत के उन नवोदित साहित्यकारों और कवयित्रियों में थीं, जिनकी रचनाएँ समकालीन समाज के ज्वलंत मुद्दों पर सीधा हस्तक्षेप करती थीं, और अपनी लेखिका ताओं के माध्यम से समाज में हो रहे बदलावों और समस्याओं को बेबाकी से प्रस्तुत करती थीं।

कुंजी शब्द : पुष्पा प्रियदर्शनी ‘पुष्प’, हिंदी साहित्य,सामाजिक चेतना एवं मानवीय चेतना

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Cite : दास, एम. (2025). पुष्पा प्रियदर्शनी ‘पुष्प’ के रचनाओं में सामाजिक एवं मानवीय चेतना. इंटेलिजेंटसिया इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च, 1(3), 15 –21 .
Behavioral Practices towards Environmental Protection among Secondary Level Students in Dhanbad District (Jharkhand)
Dr. Nanda Kumari
Original Article Published Online on: Volume (1), Issue (3), October - December, (October 09, 2025)

Abstract:
In this study, behavioral tendencies of secondary-level school children towards safeguarding the environment of Dhanbad district of India are analyzed at gender dissimilarity. A questionnaire of 15 Likert-scale pro-environment behaviors was administered to gather data from 60 boys and 60 girls of each of the six selected schools. The findings show huge gender gaps: the girls indicated high to very high awareness of the environment (mean = 61.53, SD = 2.65), but the boys complained of low awareness of the environment (mean = 28.55, SD = 2.83). Independent t-test confirmed huge difference (t = -65.86, p < 0.001), but chi-square test established that there exists a non-random gender distribution by levels of performances (χ² = 120.00, p < 0.001). Overall, school children depicted moderate participation (mean = 45.04, SD = 16.78), with best practices of waste segregation and tree care. The study indicates the necessity of gender-inclusive environmental education that will reduce gaps for sustainable behaviors.

Key Words: Environmental Awareness, Secondary Schools, Students, Gender Variations.

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Cite : Kumari, N. (2025). Behavioral Practices towards Environmental Protection among Secondary Level Students in Dhanbad District (Jharkhand). Intelligentsia International Journal of Multidisciplinary Research, 1(2), 22- 27.
आधुनिक भारतीय नारी चेतना एवं इसके उत्थान मे ब्रह्म समाज की भूमिका –संक्षिप्त साहित्य समीक्षा
प्रगति सागर
Original Article Published Online on: Volume (1), Issue (3), October - December, (October 09, 2025)

सरांश :
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथा समकालीन सन्दर्भ में प्रासंगिक विषय  है। आधुनिक भारत में नारी जागरण, उसके सामाजिक, शैक्षिक तथा वैचारिक उत्थान की प्रक्रिया में ब्रह्म समाज की भूमिका से सम्बंधित साहित्यों  की  समीक्षा पर केंद्रित यह लेख विशेष रूप से 19वीं शताब्दी के वर्तमान समय  तक ब्रह्म समाज द्वारा महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए गए प्रयासों जैसे कि बाल विवाह उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा, एवं स्त्रियों के अधिकारों की सामाजिक मान्यता  आदि विविध पक्षों  में उपलब्ध साहित्य की समीक्षा प्रस्तुत करता है । साहित्य समीक्षा के परिणाम यह स्पष्ट करते हैं कि भारत में नारी शक्ति के उत्थान में  ब्रह्म समाज ने निर्णायक भूमिका निभाई है, राजा राम मोहन राय के नेतृत्व में शुरू किए गए सामाजिक सुधार आंदोलन में स्त्री मुक्ति एवं सशक्तिकरण एक केंद्रीय पक्ष के रूप में विद्यमान रहा जिसकी सपष्ट प्रभाव समकालीन समाज में महिलाओं के समाज में पुरुषों के बराबर प्रतिनिधित्व के वकालत में देखा जा सकता है ।

कुंजी शब्द : ब्रह्म समाज, राजा राम मोहन राय, साहित्य समीक्षा 

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Cite : सागर, पी. (2025). आधुनिक भारतीय नारी चेतना एवं इसके उत्थान मे ब्रह्म समाज की भूमिका –संक्षिप्त साहित्य समीक्षा. इंटेलिजेंटसिया इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च, 1(3), 28–34 .

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