ISSN: 3108-0766 (Online)

सारांश:
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ग्रामीण विकास सामाजिक आर्थिक-प्रगति की नींव है। वर्ष 2005 में पारित अधिनियम ग्रामीण जनसंख्या को प्रतिवर्ष 100 दिन का गारंटी कृत रोजगार प्रदान करने का उद्देश्य रखता है। जनपद श्रावस्ती, उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक पिछड़े जिलों में से एक है जहां मनरेगा ग्रामीण आय, रोजगार तथा आधारभूत संरचना विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार ग्रामीण गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा,रोजगार सृजन और सतत विकास का एक सशक्त माध्यम है। यह अध्ययन जनपद श्रावस्ती के संदर्भ में मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण विकास की भौगोलिक पड़ताल प्रस्तुत करता है। अध्ययन में जनपद के लिए विभिन्न विकास खण्डों में मनरेगा के कार्यान्वयन,श्रम दिवस सृजन,आर्थिक सशक्तिकरण,प्रवास नियंत्रण एवं भौतिक- सामाजिक अवसंरचना के निर्माण का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में यह पाया गया कि मनरेगा ने श्रावस्ती के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्धता बढ़ाई है, किंतु कार्यान्वयन की पारदर्शिता तकनीकी दक्षता और समयबद्ध भुगतान जैसे मुद्दे अब भी चुनौतियां बने हुए हैं।
मुख्यशब्द: मनरेगा, ग्रामीण विकास, रोजगार गारंटी, आजीविका सुरक्षा,श्रम दिवस, आर्थिक सशक्तीकरण, प्रवास नियंत्रण, भौतिक-सामाजिक अवसंरचना
Abstract
This study explores innovative approaches for enhancing the acquisition of English as a lingua franca, aiming to bridge the gap between theory and practice in educational settings. It reviews recent language acquisition theories, including Communicative Language Teaching (CLT), Task-Based Learning (TBL), and Content and Language Integrated Learning (CLIL), and analyzes their practical applicability in diverse classroom environments. Central to the study is the role of technology, which has become a crucial tool in modern language learning. The use of language learning apps, gamification, and interactive multimedia is highlighted as effective strategies for language acquisition. The present study also addresses real-world challenges faced by learners and educators, such as cultural barriers, demotivation, and limited resources, offering practical solutions to these problems. The findings reveal that a mixed approach, combining theory-based creativity with real-world applications, can significantly improve English language mastery while boosting learner engagement and confidence and it emphasizes the need for further research on integrating theoretical frameworks with emerging technologies in language education for future advancements.
Key Words: English Language Acquisition, Communicative Language Teaching, Task-Based Learning, Hybrid Approach, Language-Learning Strategies.
Abstract
Mahatma Gandhi was a modern and visionary educationist whose ideas on education were far ahead of his time. Unlike many of his contemporaries, Gandhi combined deep theoretical understanding with practical application. His philosophy of education, popularly known as Basic Education which emphasizes on holistic development, moral values, self-reliance, dignity of labour and learning through productive work. Gandhi viewed education as a powerful means for building character, social responsibility and national development. In the year 2020, the Government of India introduced the National Education Policy (NEP) 2020 with the aim of transforming the Indian education system and preparing the nation for the challenges of the twenty-first century. The core vision of NEP 2020 is to provide inclusive, equitable and quality education for all, thereby contributing to the creation of a developed and self-reliant India. The policy focuses on experiential learning, vocational skills, value-based education, multilingualism, flexibility and holistic development of learners. A close examination of NEP 2020 reveals strong similarities with Gandhian educational philosophy. Many of its principles reflect Gandhi’s emphasis on practical learning, character formation, social commitment and integration of education with life and work. Thus, NEP 2020 can be seen as a contemporary reflection and revival of Gandhi’s educational ideas, adapted to meet present-day needs and aspirations.
Key Words: Mahatma Gandhi, NEP, 2020, Inclusive Education, Holistic Education
शोध सार
अमेरिका में 1960 के दशक में इंटरनेट की शुरुआती खोज और बाद के वर्षों में उसमें हुई निरंतर प्रगति, उपभोक्ता-केंद्रित प्रवृत्तियों तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में इसके बढ़ते प्रयोग ने 20वीं सदी के अंतिम दशक तक इसे विश्व-भर में एक क्रांतिकारी एवं परिवर्तनकारी खोज के रूप में स्थापित कर दिया। आज की सूचना एवं संचार तकनीक अथवा डिजिटल क्रांति इसी पर आधारित है। शिक्षा का क्षेत्र भी इन परिवर्तनों से अछूता नहीं रहा और उसने इन तकनीकों को अपनाया। परिणामस्वरूप आज हम शिक्षा में तकनीक, विशेषकर आईसीटी (ICT) का व्यापक रूप से उपयोग कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) इसी तकनीकी विकास की अगली कड़ी है, जिसने सूचनाओं तक पहुँच, सूचनाओं के निर्माण, प्रसंस्करण तथा संपादन की प्रभावशीलता को और अधिक बढ़ा दिया है। इंटरनेट के व्यापक नेटवर्क ने विश्व-भर के ज्ञान और सूचनाओं को आपस में जोड़ दिया है, जिससे वे विभिन्न उपभोक्ताओं के लिए सहज रूप से सुलभ हो गई हैं। एआई ने इस प्रक्रिया को और अधिक संभव तथा प्रभावशाली बना दिया है। इस पृष्ठभूमि में शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया में छात्र पक्ष का गंभीरता से मूल्यांकन करना आवश्यक है, विशेषकर विद्यालय स्तर पर यह समझना कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता विद्यार्थियों के लिए कितनी उपयोगी है, इससे जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं और इनसे संबंधित चिंताओं का समाधान कैसे किया जा सकता है। इस नवीन तकनीक या उपकरण को लेकर लगातार नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं, साथ ही इसे अधिक विश्वसनीय और उपयोगी बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास भी किए जा रहे हैं।
मुख्य शब्द : कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विद्यालय शिक्षा, अधिगम व्यवहार
सार :
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसमें वर्तमान में 28 राज्य एवं 8 केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं। इतने विशाल एवं विविधतापूर्ण लोकतंत्र को लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाए रखने में नागरिकों, संस्थाओं एवं विभिन्न लोकतांत्रिक एजेंसियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस प्रक्रिया में मीडिया का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। लोकतंत्र के चौथे एवं सशक्त स्तंभ के रूप में भारतीय मीडिया ने देश में लोकतांत्रिक चेतना, पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व को बनाए रखने में पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाई है। प्रस्तुत अध्ययन भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति तथा इसमें मीडिया की भूमिका, गुणवत्ता, विश्वसनीयता, वैधता एवं उद्देश्यपरकता के संदर्भ में एक निष्पक्ष एवं विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा प्रकाशित प्रतिवेदनों, विश्व रैंकिंग में भारतीय मीडिया की स्थिति तथा उपलब्ध साहित्य समीक्षा पर आधारित है। अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मीडिया की विश्वसनीयता में उल्लेखनीय गिरावट आई है। मुद्दों के चयन, समाचारों के प्रस्तुतीकरण, प्रायोजन, व्यावसायीकरण तथा पत्रकारिता मानकों के संदर्भ में मुख्यधारा मीडिया के प्रति विभिन्न प्रकार की धारणाएँ उभरी हैं। इसे राष्ट्रवाद, अंतरराष्ट्रीय एकाधिकार, राजनीतिक दलों के प्रभाव तथा टीआरपी-केंद्रित दृष्टिकोण से जोड़कर देखा जाता है। साथ ही, हाल के वर्षों में सोशल मीडिया के तीव्र विस्तार तथा क्षेत्रीय मीडिया की बढ़ती भूमिका ने सूचना संप्रेषण के स्वरूप को नया आयाम प्रदान किया है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अवसर एवं चुनौतियाँ—दोनों प्रस्तुत करती है, जिनके समाधान हेतु मीडिया की स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व एवं नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
कुँजी शब्द : लोकतंत्र, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, मीडिया, टी.आर.पी.
शोध सारांश
शिक्षा का सार्वभौमिकरण वैश्विक शिक्षा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि विश्व के प्रत्येक बालक और बालिका को कम से कम प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर तक गुणवत्तापूर्ण, समान एवं सुलभ शिक्षा प्राप्त हो सके। यह अवधारणा इस मान्यता पर आधारित है कि शिक्षा सामाजिक, आर्थिक एवं मानव संसाधन विकास का मूल आधार है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएँ लंबे समय से बच्चों की विद्यालय तक पहुँच को बाधित करती रही हैं। इनमें गरीबी, कुपोषण, बाल श्रम तथा उचित भोजन की अनुपलब्धता जैसी समस्याएँ प्रमुख हैं, जो बच्चों की उपस्थिति, स्वास्थ्य एवं सीखने की क्षमता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। इन समस्याओं के समाधान हेतु भारत सरकार द्वारा प्रारंभ की गई मध्याह्न भोजन योजना एक महत्वपूर्ण पहल की। 15 अगस्त 1995 को केन्द्रीय प्रायोजित योजना के रूप में प्रारंभिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पोषणिक सहायता कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इस योजना का मुख्य उद्देश्य विद्यालयी बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराकर उनकी शैक्षणिक सहभागिता को बढ़ावा देना था। इस योजना के महत्व एवं प्रभाव को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इससे न केवल सकल नामांकन दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, बल्कि देश के करोड़ों बच्चों के स्वास्थ्य स्तर में भी सुधार हुआ, जो लंबे समय से पोषक भोजन की कमी से जूझ रहे थे। विभिन्न अध्ययनों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि इस योजना ने बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। साथ ही, इससे विद्यालयों में नामांकन, नियमित उपस्थिति तथा प्रतिधारण दर में भी निरंतर सुधार देखा गया है। यद्यपि इस दिशा में निरंतर सुधार के लिए प्रयास किए जा रहें हैं किंतु अभी भी लक्षित प्रयास की आवश्यकता है ।
कुंजी शब्द : मध्याहन भोजन कार्यक्रम, कुपोषण, खाद्य सुरक्षा, बाल स्वास्थ एवं पोषण
शोध सारांश
प्रस्तुत अध्ययन झारखण्ड के धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड में आदिवासी महिलाओं के खान-पान, स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी जागरूकता के स्तर का विश्लेषण करता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, टुंडी प्रखंड की पूरी जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है, जिसमें अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 40.7% है। आदिवासी महिलाओं का स्वास्थ्य एवं पोषण उनकी जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है, परंतु आधुनिक परिवर्तनों के बावजूद इस क्षेत्र में जागरूकता का स्तर अपेक्षाकृत कम पाया गया है।अध्ययन के लिए टुंडी प्रखंड की 25 पंचायतों में से 4 पंचायतों का चयन किया गया। प्रत्येक पंचायत से 3 गांवों तथा प्रत्येक गांव से 20 महिलाओं का चयन किया गया, जिससे कुल 240 महिलाएं नमूने में शामिल हुईं। आंकड़ों के विश्लेषण हेतु केंद्रीय प्रवृत्ति की माप तकनीक का प्रयोग किया गया।परिणामों से ज्ञात हुआ कि 40% महिलाओं का शारीरिक स्वास्थ्य निम्न स्तर का है, जबकि केवल 18.33% महिलाएं उच्च स्तर का स्वास्थ्य बनाए रखती हैं। मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में 32.08% महिलाएं कमजोर पाई गईं। स्वच्छता के मामले में 42.9% महिलाएं उच्च स्तर पर हैं, परंतु 22.9% महिलाएं निम्न या अतिनिम्न स्तर पर रहती हैं।अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि 80% महिलाएं नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं करातीं तथा 87.5% महिलाएं योग या व्यायाम नहीं अपनातीं। इसके अतिरिक्त, 51.6% महिलाएं सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से अनभिज्ञ हैं और 70% महिलाएं मातृत्व पोषण से वंचित हैं। चिंताजनक रूप से 54.16% महिलाएं कुपोषण के लक्षणों को पहचान नहीं पातीं।टुंडी प्रखंड की आदिवासी महिलाओं में स्वास्थ्य, पोषण एवं स्वच्छता संबंधी जागरूकता का स्तर संतोषजनक नहीं है। सुधार हेतु स्वास्थ्य शिक्षा, पोषण प्रशिक्षण तथा सेवाओं की सुलभता बढ़ाना आवश्यक है। आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं एवं महिला समूहों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाकर ही इस समुदाय के जीवन स्तर में सुधार संभव है।
कुंजी शब्द : आदिवासी महिलाएँ, खान –पान, स्वास्थ एवं पोषण, जागरूकता
Abstract
Space research in India has evolved remarkably over the past several decades, transforming the country into one of the leading space-faring nations in the world. Beginning with modest sounding rocket experiments in the 1960s, India’s space program has expanded significantly under the guidance of visionary scientists and institutions such as the Indian Space Research Organisation (ISRO). The primary objective of India’s space research has been to harness space technology for national development, scientific advancement, and global cooperation. Major milestones include the launch of the Aryabhata satellite in 1975, the development of indigenous launch vehicles such as PSLV and GSLV, and successful space missions like Chandrayaan, Mangalyaan, and Aditya-L1. These achievements have demonstrated India’s growing capability in satellite technology, planetary exploration, communication systems, and remote sensing. Despite these accomplishments, India’s space sector faces several challenges, including technological constraints, increasing competition in the global space industry, the need for higher investment in research and development, and the complexities associated with deep space exploration. Looking ahead, India aims to strengthen its space capabilities through ambitious missions such as the Gaganyaan human spaceflight program, advanced satellite systems, and expanded international collaborations. The future of Indian space research lies in innovation, sustainable space technology, and continued scientific exploration to support national progress and global knowledge.
Key Words: Space Research, ISRO, Chandrayaan Mission, Satellite Technology, Space Exploration.